
About Gurukul Vidyapeeth
A centre of modern education rooted in a life of values

संस्कारमय जीवन पर आधारित आधुनिक शिक्षा केन्द्र
Welcome to Gurukul Vidyapeeth
On 30 April 1968, the holy day of Akshaya Tritiya, Shri 108 Lajja Ram Ji Maharaj — following the Rishikul tradition — founded Shri Lajja Ram Sanskrit Mahavidyalaya at Tirth Pandu-Pindara, Jind. Spreading Indian culture, preparing learned and virtuous scholars, preserving Sanskrit and bringing education to the weaker and deprived sections of society have always been its core aims. Thousands of students have since studied up to Shastri and Acharya level and serve the nation in many distinguished fields.
Recognising that children today must know modern languages, science and technology while keeping their cultural identity, Peethadheeshwar Shri Mahant Rajesh Swaroop Ji Maharaj of Shri Lajja Ram Ashram, Tirth Pandu-Pindara & Haridwar resolved to offer modern education together with the sanskaras of the Rishikul tradition. With the support of the Ashram's trustees, Gurukul Vidyapeeth was founded on 2 February 2006, Vasant Panchami.
The school follows the CBSE, New Delhi curriculum from Nursery to Class XII in Hindi and English medium. For this purpose about 2 acres of land and the large building ‘Sigma Vidya Kunj’ at village Pandu-Pindara, Gohana Road, Jind were acquired and developed as Gurukul Vidyapeeth.
हमारे बारे में
प्रातःस्मरणीय श्री 108 आत्मस्वरूप जी महाराज, शिष्य श्री 108 रामचन्द्र जी महाराज शिष्य श्री 108 लज्जा राम जी महाराज ने ऋषिकुल परम्परा का अनुसरण करते हुए दिनांक 30 अप्रैल 1968, वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर श्री लज्जा राम संस्कृत महाविद्यालय, तीर्थ पाण्डु-पिण्डारा, जीन्द की स्थापना की। भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार, सदाचारी एवं सुयोग्य विद्वानों के निर्माण, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन हेतु विद्या एवं धर्म का प्रचार-प्रसार, सर्वभाषा-जननी संस्कृत भाषा का संरक्षण एवं संवर्धन तथा विशेष रूप से समाज के असमर्थ एवं वंचित वर्गों के लिए शिक्षा के माध्यम से बहुआयामी उन्नति के साधन उपलब्ध कराना संस्था के प्रमुख उद्देश्यों में रहा है।
संस्कृत शिक्षा के माध्यम से अपने प्रतिभाशाली बालक-बालिकाओं को विद्वान बनाकर राष्ट्र एवं समाज की सेवा के योग्य बनाने की अभिलाषा रखने वाले अभिभावकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए संस्था ने विद्यार्थियों को कक्षा प्रथमा से स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्रदान करने का सतत प्रयास किया है। संस्था की स्थापना से लेकर आज तक हजारों छात्र-छात्राओं ने शास्त्री एवं आचार्य जैसी उच्च कक्षाओं की शिक्षा प्राप्त कर समाज एवं राष्ट्र के विभिन्न प्रतिष्ठित क्षेत्रों में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहे है। यहाँ से शिक्षा प्राप्त अनेक स्नातकों ने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित करते हुए संस्था, समाज एवं राष्ट्र का गौरव बढ़ाया है।
जिस समय विश्व की अनेक सभ्यताएँ अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थीं, उस समय भारत में ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में गहन एवं व्यापक चिन्तन विकसित हो चुका था। ऐसा कोई प्रमुख ज्ञान-विज्ञान क्षेत्र नहीं था, जो भारतीय मनीषा की चिन्तन-परम्परा से अछूता रहा हो। भारत की प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था ने सदैव ज्ञान को मानव कल्याण, प्रकृति के संरक्षण और समाज के समग्र विकास से जोड़ा है।
आज वैश्वीकरण एवं अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के विस्तार को रोक पाना सरल नहीं है। तथापि यह निश्चय ही सम्भव है कि हम अपने विचारों, संस्कारों एवं जीवन-मूल्यों के माध्यम से इस प्रक्रिया को सकारात्मक दिशा प्रदान करें और संसार के समक्ष ऐसा आदर्श प्रस्तुत करें, जिसमें प्राकृतिक एवं भौतिक संसाधनों के उपयोग और मानव कल्याण के मध्य संतुलन स्थापित हो सके।
वैश्वीकरण के इस युग में अपनी सांस्कृतिक अस्मिता एवं मूल पहचान को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से परिचित होना समय की आवश्यकता है। आधुनिक भाषाओं, विज्ञान, तकनीकी एवं समकालीन शिक्षा के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखते हुए पीठाधीश्वर श्रीमहन्त राजेश स्वरुप जी महाराज श्री लज्जा राम आश्रम, तीर्थ पाण्डु-पिण्डारा, हरिद्वार ने इस आवश्यकता को अनुभव किया। इसी दृष्टि से शिक्षार्थियों को ऋषिकुल परम्परा के संस्कारों के साथ आधुनिक शिक्षा प्रदान करने का संकल्प लिया गया।
विगत कई वर्षों से संस्थापक के मन में यह प्रश्न उठता रहा कि हमारे नन्हे-मुन्ने बालकों एवं बालिकाओं में बाल्यकाल से ही राष्ट्रभक्ति, संस्कार, अनुशासन एवं उत्तरदायित्व-बोध के भाव क्यों न विकसित किए जाएँ, ताकि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ भावी जीवन की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाया जा सके। इस विषय पर समय-समय पर अनेक शिक्षाविदों एवं शुभचिन्तकों से विचार-विमर्श भी होता रहा। हृदय में एक गहरी अनुभूति थी और लक्ष्य की एक धुंधली-सी रूपरेखा भी, परन्तु इस महत्वपूर्ण कार्य को साकार करने के लिए आवश्यक साधनों एवं संसाधनों की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती थी। जिसको स्वीकार करते हुए परम पूज्य पीठाधीश्वर श्रीमहन्त राजेश स्वरुप जी महाराज ने श्री लज्जा राम आश्रम, तीर्थ पाण्डु पिण्डारा एवं हरिद्वार के अनेक सहयोगी ट्रस्टियों के सहयोग एवं मार्गदर्शन से हृदय की इस अनुभूति को मूर्त रूप देने का आधार प्रदान किया और 2 फरवरी, 2006, वसन्त पंचमी के पावन अवसर पर गुरूकुल विद्यापीठ की स्थापना हुई।
इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (C.B.S.E.), नई दिल्ली द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार नर्सरी से बारहवीं कक्षा तक हिन्दी एवं अंग्रेजी माध्यम में छात्र-छात्राओं के लिए शिक्षा की योजना बनाई गई।
उक्त शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ग्राम पाण्डु-पिण्डारा, गोहाना रोड, जीन्द में लगभग 2 एकड़ भूमि तथा विशाल भवन ‘सिग्मा विद्या कुंज’ (Sigma Vidya Kunj) को अधिग्रहित कर ‘गुरूकुल विद्यापीठ (Gurukul Vidyapeeth)’ के रूप में विकसित किया गया है।

Chairman & Founder
पीठाधीश्वर श्रीमहन्त राजेश स्वरुप जी महाराज
Gurukul Vidyapeeth, Jind
गुरुकुल विद्यापीठ - शिक्षा, संस्कार एवं समान अवसर
आज के तकनीकी एवं डिजिटल युग में शिक्षा निरन्तर आधुनिक होती जा रही है, किन्तु अनेक स्थानों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामान्य परिवारों के लिए आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण भी बनती जा रही है। ऐसे समय में गुरूकुल विद्यापीठ का प्रयास है कि प्राचीन भारतीय गुरूकुल परम्परा के संस्कारों एवं मूल्यों को आधुनिक शिक्षा के साथ समन्वित किया जाए।
भारतीय परम्परा में श्रीकृष्ण और सुदामा का प्रसंग गुरु-शिष्य परम्परा, समानता, आत्मीयता एवं संस्कारमय शिक्षा का प्रेरणादायी उदाहरण है। गुरूकुल विद्यापीठ भी इसी आदर्श से प्रेरणा लेते हुए विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें ज्ञान के साथ संस्कार, अनुशासन, आत्मनिर्भरता, चरित्र-निर्माण एवं मानवीय मूल्यों का विकास हो।
अतः समाज की वर्तमान आवश्यकताओं एवं छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए गुरूकुल विद्यापीठ निरन्तर प्रयत्नशील रहेगा। भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों की सुदृढ़ आधारशिला पर आधुनिकतम शिक्षा का समन्वय स्थापित करना संस्था का प्रमुख संकल्प है। हमें विश्वास है कि यह प्रयास विद्यार्थियों को आधुनिक विश्व की चुनौतियों का सामना करने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने में सक्षम बनाएगा।
दानी सज्जनों, शुभचिन्तकों, अभिभावकों एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के सहयोग, परिश्रम एवं लगन से यह गुरूकुल विद्यापीठ वटवृक्ष की भाँति निरन्तर विकसित एवं विस्तारित होता रहे—यही हमारा संकल्प है। शिक्षा के क्षेत्र में निरन्तर प्रगति करते हुए यह संस्था ऐसे संस्कारवान, प्रतिभाशाली, चरित्रवान एवं राष्ट्रनिष्ठ छात्र-छात्राओं का निर्माण करे, जो अपने ज्ञान एवं प्रतिभा से भारतवर्ष की कीर्ति को पुनः विश्व के सर्वोच्च ज्ञान-मंच पर प्रतिष्ठित करने में अपना योगदान दे सकें—यही हमारी हार्दिक मंगलकामना है।
इसी महान संकल्प की प्रेरणा हमें वेदवाणी से प्राप्त होती है—
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥
“तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु”—मेरा मन सदैव शुभ, श्रेष्ठ, रचनात्मक एवं लोककल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो। यही गुरूकुल विद्यापीठ की शिक्षा-दृष्टि और भविष्य के प्रति हमारा पवित्र संकल्प है।
पीठाधीश्वर
श्रीमहन्त राजेश स्वरुप जी महाराज
श्री लज्जा राम आश्रम एवं शैक्षणिक संस्थाएें

Vice Chairman
डाॅ. कान्ता शर्मा
Gurukul Vidyapeeth, Jind
शिक्षा का महत्व एवं उद्देश्य
शिक्षा (ज्ञान) ही वह तत्व है, जो मनुष्य को विवेकशील बनाकर उसे पशुओं से अलग करती है और सच्चे अर्थों में ऋग्वेद की उक्ति—“मनुर्भव” अर्थात् “मानव बनो”—के भाव को विकसित करती है। शिक्षा मनुष्य के जीवन से अनेक प्रकार के भ्रम, संदेह और संशयों को दूर करती है तथा कई बार प्रत्यक्ष के पीछे छिपे परोक्ष सत्य का भी बोध कराती है। शिक्षा प्राणियों के तृतीय नेत्र के समान है। जिसके पास ज्ञानरूपी यह तृतीय नेत्र नहीं है, वह एक प्रकार से अज्ञान के अन्धकार में जीवन व्यतीत करता है।
शिक्षा के अभाव में मनुष्य का जीवन कुत्ते की पूँछ के समान निरर्थक हो जाता है। शिक्षा के बल पर ही मनुष्य देश-विदेश में सर्वत्र सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। सांसारिक समस्त धनों में शिक्षा ही सर्वोत्तम धन है, क्योंकि इसे न कोई चुरा सकता है, न मूल्य देकर खरीदा जा सकता है और न ही इसका कभी नाश होता है। ज्ञान ऐसा धन है, जो बांटने से घटता नहीं, बल्कि निरन्तर बढ़ता जाता है।
इन्द्रियों को वश में करने की क्षमता का विकास करना तथा ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, शोक आदि बन्धनों से मनुष्य को मुक्त करना शिक्षा का प्रमुख प्रयोजन है। शिक्षा के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन के चरम उद्देश्य की ओर अग्रसर होता है और वास्तविक सुख एवं शान्ति की प्राप्ति करता है। इसी भाव को भारतीय ज्ञान-परम्परा में कहा गया है—“सा विद्या या विमुक्तये”, अर्थात् वही विद्या है जो मनुष्य को बन्धनों से मुक्त करे।
सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय में शिक्षा और धर्म का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध माना गया है। ‘धर्म’ शब्द की व्याख्या अनेक प्रकार से की गई है। “धारणाद् धर्म इत्याहुः, धर्मो धारयते प्रजाः”—अर्थात् जो धारण करता है और समाज को धारण करने योग्य बनाता है, वही धर्म है। जीवन में उचित आचार-विचार, सद्व्यवहार, कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों के पालन की ओर मनुष्य को प्रेरित करने वाला तत्व धर्म है और धर्म का मूल आधार ज्ञान है। ज्ञानी व्यक्ति ही धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने वाला माना गया है तथा उसका सदाचरण समाज के लिए आदर्श एवं शिष्टाचार का स्वरूप ग्रहण करता है।
धैर्य, शान्ति, अहिंसा, दया, करुणा, सहानुभूति, सौजन्य, प्रेम, इन्द्रिय-निग्रह और सत्य जैसे शाश्वत नैतिक एवं मानवीय गुण व्यक्ति के जीवन को मर्यादित एवं विकसित करते हैं। ये गुण केवल व्यक्ति का ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के चरित्र का भी निर्माण करते हैं। इसी संदर्भ में कहा गया है—
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
अर्थात् जो व्यवहार स्वयं को अपने लिए अच्छा नहीं लगता, वैसा व्यवहार दूसरों के प्रति भी नहीं करना चाहिए। धर्म और ज्ञान मनुष्यों को परस्पर जोड़ते हैं, तोड़ते नहीं। अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहना ही धर्मपालन का वास्तविक स्वरूप है। उदाहरण के लिए, एक सैनिक कर्तव्यबोध से प्रेरित होकर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है। उचित और अनुचित का विवेक समाप्त न हो तथा मनुष्य में पशुता के स्थान पर मानवोचित गुणों का विकास बना रहे—इसीलिए धर्म को शिक्षा का अभिन्न अंग माना गया है।
विद्यार्थी के जीवन में माता, पिता और आचार्य (शिक्षक)—इन तीनों का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जब इन तीनों श्रेष्ठ शिक्षकों का समुचित मार्गदर्शन विद्यार्थी को प्राप्त होता है, तब उसका जीवन ज्ञान-ज्योति से प्रकाशित हो उठता है। जो माता-पिता अपनी सन्तान को ज्ञान एवं सदाचार के मार्ग पर अग्रसर करते हैं, वे वास्तव में उसके सच्चे मित्र हैं; इसके विपरीत, जो माता-पिता सन्तान को शिक्षा और संस्कार से वंचित रखते हैं, वे उसके हितैषी नहीं कहे जा सकते।
इसी प्रकार सदाचार, अनुशासन एवं जीवन-मूल्यों की शिक्षा देने वाले आचार्य का स्थान अत्यन्त ऊँचा माना गया है। आचार्य का आदर्श स्वरूप वह है, जो स्वयं सदाचरण करता हुआ अपने शिष्यों को यह शिक्षा देता है—
“यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि।”
अर्थात् “हमारे जो श्रेष्ठ आचरण हैं, उन्हीं का अनुसरण करना, अन्य का नहीं।” आचार्य ही विद्यार्थी को उचित-अनुचित, सत्य-असत्य तथा सदाचार-दुराचार का विवेक प्रदान करता है। केवल शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है; यदि कोई शिक्षक स्वयं आचार-विचार से भ्रष्ट हो, तो उसका ज्ञान समाज के लिए आदर्श नहीं बन सकता। भारतीय परम्परा में शिक्षक के ज्ञान के साथ उसके आचरण की शुद्धता को भी समान रूप से आवश्यक माना गया है।
शिक्षा की प्राप्ति में केवल शिक्षक की ही नहीं, बल्कि परिवार, वातावरण, समाज और परिवेश की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः परिवार, कुटुम्ब, पड़ोस तथा विद्यालय का वातावरण शुद्ध, संस्कारित एवं सदाचारपूर्ण होना चाहिए। बालक अपने आसपास के वातावरण से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से बहुत कुछ सीखता है। उसमें पड़ोसियों एवं समाज के लोगों के अच्छे-बुरे संस्कार भी प्रवेश कर जाते हैं। जिस प्रकार वायु अपने आसपास के स्थानों की सुगन्ध या दुर्गन्ध को ग्रहण कर चारों ओर फैला देती है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने परिवेश के संस्कारों से प्रभावित होता है।
अतः उपर्युक्त तथ्यों से मानव जीवन में शिक्षा की अनिवार्यता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। मानव जन्म स्वयं अत्यन्त दुर्लभ है और उस पर भी श्रेष्ठ शिक्षा एवं संस्कारों की प्राप्ति उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण, विवेक के विकास, चरित्र-निर्माण, आत्मसंयम, सदाचार और राष्ट्रहित की भावना को जागृत करने का माध्यम है। ऐसी शिक्षा ही व्यक्ति को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाती है और उसे अपने जीवन के साथ-साथ समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध कराती है।
डाॅ. कान्ता शर्मा
उपाध्यक्षा
Moments That Shape Us
The Visionaries Behind Gurukul
Shri Lajja Ram Bashesar Dass Gurukul Vidyapeeth is run by Shri Lajja Ram Shiksha Sansthan.

पीठाधीश्वर श्रीमहन्त राजेश स्वरुप जी महाराज
Peethadheeshwar Shri Mahant Rajesh Swaroop Ji Maharaj
- Shri Lajja Ram Ashram, Tirth Pandu-Pindara & Haridwar
- Founded Gurukul Vidyapeeth on 2 February 2006, Vasant Panchami

डाॅ. कान्ता शर्मा
Dr. Kanta Sharma
- Shri Lajja Ram Bashesar Dass Gurukul Vidyapeeth
- Run by Shri Lajja Ram Shiksha Sansthan

- M.A., B.Ed.
- 10 Years Administrative Experience
- 8 Years Teaching Experience
Our History
Rooted in the Rishikul tradition of Shri Lajja Ram Sanskrit Mahavidyalaya, Tirth Pandu-Pindara, Jind.
1968
Shri Lajja Ram Sanskrit Mahavidyalaya
Founded on Akshaya Tritiya, 30 April
2006
Gurukul Vidyapeeth Founded
Vasant Panchami, 2 February
2009
School Opens
First opening of school, 1 April
2025
CBSE Affiliation Extended
Valid till 31 March 2030
Our Logo & Motto

तेजो मयि धेहि
Atharvaveda, Shaunaka Samhita — Kanda 7, Sukta 89
हे अग्ने! आप वृद्धि और प्रकाश के स्वरूप हैं; मैं भी आपके समान उन्नति और प्रकाश को प्राप्त करूँ। आप तेजस्वरूप हैं, मुझे भी तेज प्रदान करें।
“O Agni! You are the form of growth and light; may I too attain progress and light like you. You are radiance itself — grant me radiance too.”
शिक्षा के द्वारा ऐसा ज्ञान अपेक्षित है जिसमें मनुष्य का सर्वांगीण विकास हो। अथर्ववेद की शौनक संहिता काण्ड-7, सुक्त-89 में वर्णित उपरोक्त मंत्र में वर्णित है -
समग्र भावार्थ — इन मन्त्रों में जल और अग्नि के माध्यम से शुद्धता, स्वास्थ्य, दीर्घायु, तेज, बल, यश और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना की गई है। साधक प्रार्थना करता है कि जल उसके पाप और अशुद्धियों को दूर करे तथा अग्नि उसे तेज, वर्चस्, आयु, सामर्थ्य और उन्नति प्रदान करे।
हे प्रभु आप जो अपने जाजज्वलयमान प्रकाश से हमारे अन्तर को आलोकित करते हैं और हमें सब प्रकार का ज्ञान देते हैं, हमें ऐसा तेज प्रदान करें कि जिसको प्राप्त कर हम सभी दिशाओं में प्रगति कर सकें। प्रभु से केवल ज्ञान की कामना हमने नहीं की बल्कि हमें सभी दिशाओं में प्रगति करनी है। हम एक समाज और राष्ट्र की चहुँमुखी विकास चाहते हैं तो ज्ञान के फलस्वरूप व्यक्ति में ऐसे चरित्र का निर्माण होना चाहिए कि उसमें सामाजिक संवेदनशीलता आये। प्रमाणिकता, सहिष्णुता, परस्पर सहयोग एवं सद्भाव के गुण उसके चरित्र का अंग बनने चाहिए। यदि शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का साधन बनना है तो केवल मात्र अक्षर ज्ञान देने वाली शिक्षा से यह उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकता। हमें ऐसे क्रियाकलापों को अपने पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान देना होगा जिससे हम अपनी शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक शक्तियों का विकास करते हुए नाता जोड़ सकें।
“तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित।”
“चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं।”
यह संकल्प यदि शिक्षा मंदिरों के वायुमण्डल में पूर्ण व्याप्त हो गया तो आज सभी प्रश्न स्वयं हल होते दिखाई देंगे।
संस्था ध्येय चिह्न में सूर्य, शंख, दीपक और कमल विद्यमान हैं।

सूर्य
The Sun
Universal radiance — energy, discipline, hard work and self-confidence that light up society and the nation.

शंख
The Conch (Panchjanya)
Lord Krishna's Panchjanya proclaims dharma, truth and justice — the call to stand fearlessly for what is right.

दीपक
The Lamp (Deepak)
The lamp burns itself to give light to others — a lesson in sacrifice, service and devotion to duty.

कमल
The Lotus (Kamal)
Purity amid the mire — rising above worldly vices to walk the path of truth, virtue and selfless service.

सूर्यThe Sun
सूर्य भगवान सार्वभौमिक तेज के प्रतीक हैं। उनकी ऊष्मा जीवनदायिनी है और उनका तेज समस्त चराचर जगत को ऊर्जा एवं प्रकाश प्रदान करता है। वे जीवन, शक्ति, शौर्य, पराक्रम और उत्साह के मूल स्रोत हैं। सूर्य की किरणें पृथ्वी पर जीवन का संचार करती हैं तथा मनुष्य को निरन्तर कर्म, पुरुषार्थ और प्रगति की प्रेरणा देती हैं। जिस प्रकार सूर्य स्वयं प्रकाशित होकर सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने ज्ञान, संस्कार, सदाचार और कर्मों से समाज तथा राष्ट्र को प्रकाशमान करना चाहिए।
सूर्य हमें यह संदेश देता है कि जीवन में निरन्तर तेज, ऊर्जा, अनुशासन, परिश्रम और आत्मविश्वास बनाए रखते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

शंखThe Conch (Panchjanya)
भगवान श्रीकृष्ण का पांचजन्य शंख धर्म, सत्य, न्याय और कल्याण का उद्घोष करता है। इसकी दिव्य ध्वनि की तरंगों और वीर स्वर से पापी, दुराचारी, अन्यायी एवं दुर्जनों के हृदय में भय उत्पन्न होता है, जबकि कर्तव्यपरायण, देश एवं मानवता के प्रति समर्पित वीर पुरुषों का हृदय शंखनाद सुनकर उत्साह, उमंग और साहस से भर उठता है।
पांचजन्य का शंखनाद केवल युद्ध का आह्वान नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की विजय और अन्याय पर न्याय की स्थापना का पवित्र संदेश है। यह मनुष्य को अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होकर सत्य, धर्म और राष्ट्रहित के मार्ग पर निर्भीकता से आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
पांचजन्य हमें यह संदेश देता है कि जब भी समाज में अधर्म, अन्याय और असत्य का प्रभाव बढ़े, तब सज्जन एवं कर्तव्यनिष्ठ लोगों को जागृत होकर सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अपना पुरुषार्थ करना चाहिए।

दीपकThe Lamp (Deepak)
दीपक स्वयं कष्ट का वरण करके दूसरों के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने का संदेश देता है। अंधकार में बैठे हुए व्यक्ति को अपने जीवन की बाती और अपने अन्तर्मन का तेज जलाकर प्रकाश प्रदान करना—यही तो जलते हुए दीपक का महान संदेश है। वह स्वयं तिल-तिल जलता है, केवल दूसरों को प्रकाश देने के लिए। उसने कब अपने लिए प्रकाश की कामना की? वह स्वयं अंधकार के बीच रहकर भी प्रत्येक घर और कुटिया को अपने आलोक से प्रकाशित करता है।
दीपक हमें त्याग, सेवा, समर्पण, परोपकार और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है। जिस प्रकार दीपक अपने अस्तित्व को मिटाकर संसार को प्रकाश देता है, उसी प्रकार जो मनुष्य अपने देश, समाज और मानवता के कल्याण के लिए अपने सुख-सुविधाओं का त्याग करके अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे वास्तव में धन्य हैं। वही वंदनीय हैं, वही अनुकरणीय हैं और वही समाज के सच्चे पथ-प्रदर्शक हैं। हमें भी अपने जीवन को ऐसे दीपक के समान बनाना चाहिए, जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन से अज्ञान, निराशा और अंधकार को दूर करे। हमारा जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त मानवता के कल्याण के लिए समर्पित होना चाहिए।

कमलThe Lotus (Kamal)
कमल शुचिता, पवित्रता, त्याग और समर्पण का प्रतीक है। संसार में व्याप्त काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी पंक में रहते हुए भी जो अपनी पवित्रता और निर्मलता को बनाए रखता है, उसे ही पंकज अर्थात् पंक में जन्म लेने वाला कमल कहा जाता है।
कमल हमें यह संदेश देता है कि मनुष्य को परिस्थितियाँ कैसी भी हों, अपने विचारों, आचरण और संस्कारों की पवित्रता को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। कमल जल में रहकर भी जल से ऊपर उठकर खिलता है। इसी प्रकार मनुष्य को भी संसार में रहते हुए मोह-माया और सांसारिक विकारों से ऊपर उठकर सत्य, धर्म, सदाचार और कर्तव्य के मार्ग पर चलना चाहिए। अपनी शुचिता और पवित्रता का उसे किंचित मात्र भी दम्भ नहीं होता। वह तो निःस्वार्थ भाव से केवल प्रभु के चरणों में समर्पित होने की अभिलाषा अपने हृदय में संजोए रहता है। यह मेरा देश और इस देश में निवास करने वाला समाज—यही तो नारायण का प्रत्यक्ष स्वरूप है। अतः यदि मैं अपनी सामर्थ्य, ज्ञान, विज्ञान, प्रतिभा, आभा, प्रभा, शुचिता और पवित्रता को देश एवं समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दूँ, तो इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या सौभाग्य हो सकता है? कमल हमें सिखाता है कि जीवन में पवित्रता हो, कर्म में निःस्वार्थता हो, हृदय में विनम्रता हो और जीवन का प्रत्येक प्रयास राष्ट्र एवं समाज के कल्याण के लिए समर्पित हो। यही कमल का संदेश है और यही सच्चे जीवन की सार्थकता है।

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